Monday, January 11, 2016

शुद्र vr अछूत

शुद्र vr अछूत
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वर्तमान समय से देखा जा सकता है कि जो वर्ग obc है, वही शूद्र है, परंतु वो कभी अपने आपको शूद्र नहीं मानता है, वह तो शूद्र सिर्फ sc st अर्थात अछूतों को ही मानता है, जबकि वास्तविकता यह है कि sc st अर्थात अश्यप्रश्य कभी शुद्र थे ही नहीं, उन्हें अतिशूद्र कहा गया है, जो शूद्रों का भाग नहीं वल्कि चारों वर्णों के बाहर अवर्ण की स्थिति का निरूपण था। अब प्रश्न उपस्तिथ होता है कि obc वर्ग अर्थात शूद्र अपने को शूद्र क्यों नहीं मानता? इसके कई कारण है, पहला कारण तो यह है कि वह हिन्दू या सनातन धर्म के बारे में ही पूर्ण जानकारी नहीं रखता, दूसरा वो अपने इतिहास से भलीभांति परिचित नहीं है, इसलिए वो सिर्फ स्मृतियों में भरे पड़े घृणित शब्दों से छुटकारा पाने के लिए अपनी शुद्र की उपाधि अछूतों को सौंपता फिरता है और स्वम ब्राम्हण एवम् क्षत्रियत्व के दम्भ में रहता है। शुद्र राजा रहे हैं, इसमें कोई शंका की बात नहीं है, इसी कारण से वो अपने शुद्र न समझकर क्षत्रिय मानते हैं। इसके लिए हमें आर्यो के प्रारंभिक तीन वर्णों के सिद्धांत को जानना होगा। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर जी ने अपने शोध में पाया है कि 1 शूद्र सूर्यवंशी आर्यजातियो के वंश के थे। 2 भारतीय आर्य समुदाय में शूद्र का स्तर क्षत्रिय वर्ण का था। 3 एक समय आर्यो में केवल तीन वर्ण ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य हई थे। शुद्र अलग वर्ण नहीं था, बल्कि क्षत्रिय वर्ण का ही भाग था। 4 शूद्र राजाओ और ब्राम्हणो में निरंतर संघर्ष चलता रहा, जिससे ब्राम्हणो को अत्याचार, उत्पीड़न और अपमान सहना पड़ा। 5 शुद्रो के अत्याचार व् उत्पीड़न से त्रस्त ब्राम्हणो ने प्रतिशोध के कारण उनका उपनयन बंद कर दिया। 6 उपनयन पर प्रतिबन्ध से शुद्रो का सामाजिक पतन हुआ और वे वैश्यों से निचली सीढ़ी पर आ गये। उनका स्तर वैश्यों से भी निम्न हो गया। परिणामस्वरुप वे समाज का चौथा वर्ण बना दिये गए। दूसरी तरफ sc st अर्थात अतिशूद्र या अछूत - "ये छितरे आदमी बौद्ध थे। इसलिए वे ब्राम्हणो का आदर नहीं करते थे, उन्हें पुरोहित नहीं बनाते थे और उन्हें अपवित्र समझते थे। दूसरी ओर ब्राम्हण भी इन छितरे आदमियोँ को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे बौद्ध थे। उनके विरुद्ध घृणा का प्रचार करते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि छितरे आदमी अछूत समझे जाने लगे।" -डॉ आंबेडकर (सम्पूर्ण वाड्मय खंड 14)  
मनु भी अछूत एवम् अतिशूद्र को चातुर्वर्ण्य के बाहर ही रखते थे- इनका आशय था कि मूलतः चार वर्ण हैं और अतिशूद्र इन वर्णों से बाहर ही रहे इसलिए उन्होंने अश्यप्रश्य को वर्णबाह्य ( वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोग) ही कहा है। यही कारण है कि बाबा साहेब ने लिखा है कि ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सवर्ण हैं। अछूत अथवा अतिशूद्र अवर्ण कहलाते हैं।  और यही कारण रहा है कि अछूत कभी भी हिन्दू धर्म का अंग नहीं बन पाया है कि क्योंकि यह मानव शरीर के अलग आवश्यकता की वस्तु मात्र है।
     स्पष्टतः Obc अपने आपको आज तक शुद्र क्यों स्वीकार नहीं कर सका और क्षत्रियत्व का दम्भ भरता रहा यही ऊपरी कारण है और इसी कारण से वह obc भाई अछूत अर्थात sc st से भी भाईचारा नहीं निभा पाया। उल्टा वह भाईचारा छोड़ obc vr sc st बना हुआ है। व्यवहारतः देख सकते हैं कि sc st पर आज ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य से अधिक दमन, पीढ़ा का कार्य obc भाई कर रहा है और वह sc st का शोषक वर्ग बना बैठा है। यह पोस्ट सिर्फ obc भाइयो को अपनी पीढ़ा जानने एवम् वास्तविकता से अवगत होने के उद्देश्य है कि स्मृतियाँ वास्तव में अछूतों के लिए नहीं, आपके लिए तैयार की गई थीं और उनका पालन कर आपका ही दमन किया गया है, sc st के साथ। - नीरज बौद्ध
जय भीम, नमो बुद्धाय। भवतु सब्ब मंगलम!

महाराजा नाहरसिंह के बलिदान दिवस

अमर बलिदानी महायोद्धा महाराजा नाहरसिंह के बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन

सन् 1857 की रक्तिम क्रांति के समय दिल्ली के बीस मील पूर्व में जाटों की एक रियासत थी। इस रियासत के नवयुवक राजा नाहरसिंह बहुत वीर, पराक्रमी और चतुर थे। दिल्ली के मुगल दरबार में उनका बहुत सम्मान था और उनके लिए सम्राट के सिंहासन के नीचे ही सोने की कुर्सी रखी जाती थी। मेरठ के क्रांतिकारियों ने जब दिल्ली पहुँचकर उन्हें अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कर दिया और मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को फिर सिंहासन पर बैठा दिया तो प्रश्न उपस्थित हुआ कि दिल्ली की सुरक्षा का दायित्व किसे दिया जाए? इस समय तक शाही सहायता के लिए मोहम्मद बख्त खाँ पंद्रह हजार की फौज लेकर दिल्ली चुके थे। उन्होंने भी यही उचित समझा कि दिल्ली के पूर्वी मोर्चे की कमान राजा नाहरसिंह के पास ही रहने दी जाए। बहादुरशाह जफर तो नाहरसिंह को बहुत मानते ही थे।
अंग्रेजी दासता से मुक्त होने के पश्चात् दिल्ली ने 140 दिन स्वतंत्र जीवन व्यतित किया। इस काल में राजा नाहरसिंह ने दिल्ली के पूर्व में अच्छी मोरचाबंदी कर ली। उन्होंने जगह-जगह चौकियाँ बनाकर रक्षक और गुप्तचर नियुक्त कर दिए। अंग्रेजो ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का कभी साहस नहीं दिखाया। 13 सितंबर 1857 को अंग्रेजी फौज ने कश्मीरी दरवाजे की ओर से दिल्ली पर आक्रमण किया। अंग्रेजो ने जब दिल्ली नगर में प्रवेश किया तो भगदड़ मच गई। बहादुरशाह जफर को भी भागकर हुमायूँ के मकबरे में शरण लेनी पड़ी। नाहरसिंह ने सम्राट बहादुरशाह से वल्लभगढ चलने के लिए कहा, पर सम्राट के ब्रितानी भक्त सलाहकार इलाहिबख्श ने एक न चलने दी और उन्ही के आग्रह से बहादुरशाह हुमायूँ के मकबरे में रुक गए। इलाहिबख्श के मन में बेईमानी थी। परिणाम वही हुआ जो होना था। मेजर हडसन ने बहादुरशाह को हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया और उनके शाहजादों का कत्ल कर दिया। नाहरसिंह ने बल्लभगठ पहुँचकर अंग्रेजी फौज से मोरचा लेने का निश्चय किया। उन्होंने नए सिरे से मोरचाबंदी की और आगरा की ओर से दिल्ली की तरफ बढनेवाली गोरी पलटनों की धज्जियाँ उड़ा दी। बल्लभगढ़ के मोर्चे में बहुत बड़ी संख्या में अंग्रेजों का कत्ल हुआ और हजारों गोरों को बंदी बना लिया गया। इतने अघिक अंग्रेजी सैनिक मारे गए कि नालियों में से खून बहकर नगर के तालाब में पहुँच गया और तालाब का पानी भी लाल हो गया।
जब अंग्रेजों ने देखा कि नाहरसिंह से पार पाना मुश्किल है तो उन्होंने धूर्तता से काम लिया। उन्होंने संधि का सूचक सफेद झंड़ा लहरा दिया। युद्ध बंद हो गया। अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधि किले के अंदर जाकर राजा नाहरसिंह से मिले और उन्हें बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह से अंग्रेजों की संधि हो रही है और सम्राट के शुभचिंतक एवं विश्वासपात्र के नाते परार्मश के लिए सम्राट ने आपको याद किया है। उन्होंने बताया कि इसी कारण हमने संधि का सफेद झड़ा फहराया है।
भोले-भाले जाट राजा धूर्त अंग्रेजों की चाल में आ गये। अपने पाँच सौ विश्वस्त सैनिकों के साथ वह दिल्ली की तरफ चल दिए। दिल्ली में राजा को समाप्त करने या उन्हें गिरफ्तार करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में पहले ही अंग्रेजी फौज छिपा दी गई थी। राजा का संबंघ उनकी सेना से विच्छेद कर दिया और राजा नाहरसिंह को गिरफ्तार कर लिया। शेर अंग्रेजों के पिंजरे में बंद हो गया। अगले ही दिन अंग्रेजी फौज ने पूरी शक्ति के साथ वल्लभगढ पर आक्रमण कर दिया। तीन दिन के घमासान युद्ध के पश्चात ही वे राजाविहीन राज्य को अपने आधिपत्य में ले सके।
जिस हडसन ने सम्राट बहादुरशाह जफर को गिरफ्तार किया था उनके शहजादों का कत्ल करके उनका चुुल्लू भरकर खून पिया था, वही हडसन बंदी नाहरसिंह के सामने पहुँचा और अंग्रेजों की ओर से उनके सामने मित्रता का प्रस्ताव रखा। वह नाहरसिंह के महत्व को समझ सकता था। मित्रता का प्रस्ताव रखते हुए वह बोला- नाहरसिंह मैं आपको फाँसी से बचाने के लिए ही कह रहा हूँ कि आप थोड़ा झुक जाओ। नाहरसिंह ने हडसन का अपमान करने की दृष्टि से उनकी ओर पीठ कर ली और उत्तर दिया- नाहरसिंह वह राजा नहीं है जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। अंग्रेजी लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहरसिंह न रहा तो क्या, कल लाख नाहरसिंह पैदा हो जाएँगे। मेजर हडसन इस उत्तर को सुनकर बौखला गया। बदले की भावना से अंग्रेजों  ने राजा नाहरसिंह को खुलेआम फाँसी पर लटकाने की योजना बनाई। जहाँ आजकल चाँदनी चौक फव्वारा है, उसी स्थान पर वधस्थल बनाया गया, जिससे बाजार में चलने-फिरने वाले लोग भी राजा को फाँसी पर लटकता हुआ देख सकें। उसी स्थान के पास ही राजा नाहरसिंह का दिल्ली स्थित आवास था। अंग्रेजों ने जानबुझकर राजा नाहरसिंह को फाँसी देने क लिए वह दिन चुना, जिस दिन उन्होंने अपने जीवन के पैंतीस वर्ष पूरे करके छतीसवें वर्ष में प्रवेश किया था। राजा ने फाँसी का फंदा गले में डालकर अपना जन्मदिन मनाया। उनके साथ उनके तीन और नौजवान साथियों को भी फंदों पर झुलाया गया। वे थे खुशालसिंह, गुलाबसिंह और भूरेसिंह। दिल्ली की जनता ने गर्दन झुकाए हुए अश्रुपूरित नयनों से उन लोकप्रिय एवं वीर राजा को फंदे पर लटकता हुआ देखा।
फाँसी पर झुलाने के पूर्व हडसन ने राजा से पूछा था - आपकी आखिरी इच्छा क्या है? राजा का उत्तर था - मैं तुमसे और अंग्रेजी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने ख़डे हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ क्रांति की इस चिनगारी को बुझने न देना।

150 साल तक स्तन खुले रखने को मजबूर थीं

150 साल तक स्तन खुले रखने को मजबूर थीं नीची जाति की औरतें! DECEMBER 7, 2015 · PUBLIC तब ब्रिटिश भारत में आए नहीं थे, उसके पहले से ही हमारे देश का एक हिस्सा औरतों के प्रति एक बहुत अमानवीय परंपरा का पालन करता आ रहा था। दक्षिण में त्रावणकोर की औरतों के लिए शरीर का ऊपरी हिस्सा कपड़ों से ढकने की मनाही थी। 150 साल पहले हालत यह थी कि औरतों का अपने ब्रेस्ट ढकना अपराध की श्रेणी में आता था। यह परंपरा 19वीं सदी के मध्य तक चली। तब केवल नंबूदिरी, ब्राह्मण, क्षत्रिय और नायर वंश की ऊंची जाति की औरतें ही स्तन ढक सकती थीं।  नीची जाति की औरतों को मजबूरन अपना वक्षस्थल खुला रखना पड़ता था।  यहां तक कि ऊंची जाति में भी इस नियम के कई पहलू थे। मसलन, एक क्षत्रिय औरत को एक ब्राह्मण (तुलनात्मक रूप से ऊंची जाति) के सामने अपना वक्षस्थल ढकने की मनाही थी। सजा के डर से विभिन्न जातियों की लगभग सभी औरतें अपना वक्षस्थल खुला ही रखती थीं। एक बार एक रानी ने अपने महल में एक दलित औरत को देखा, जिसका वक्षस्थल ढका हुआ था, तो रानी ने उस औरत के स्तन कटवाने का आदेश दे दिया।  शाही परिवार ने भी इस सामाजिक बुराई पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब भी राजा का कारवां शहर की सड़कों पर निकलता था, तब ऊंची जाति की औरतें वक्षस्थल खुला रखकर उनपर पुष्पवर्षा करती थीं।  19वीं सदी की शुरुआत में परिस्थितियां सुधरने लगीं। काम की तलाश में केरल से लोग श्रीलंका गए और उन्हें अपने सामाजिक अधिकारों के बारे में पता चला। उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, जिससे औरतों को घर में और घर के बाहर अपने शरीर को ढकने की आजादी मिली।  लेकिन, पुरुषों ने इसे अपनी बेइज्जती समझा और इस बदलाव के जवाब में उन्होंने औरतों पर हिंसक हमले करने और उनके कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए।  1814 में त्रावणकोर के दीवान ने एक घोषणा-पत्र जारी किया, जिसने औरतों को अपना वक्षस्थल ढकने की अनुमति दी। इसके बावजूद यह लड़ाई जारी रही। लेकिन, कुछ औरतों ने पुरुषों के हमलों के जवाब में पूरे शरीर को ढकना शुरू कर दिया।  आखिर में 26 जुलाई 1859 को ब्रिटिशर्स के आगमन के साथ एक कानून पास किया गया, जिसने इस सामाजिक बुराई पर लगाम कसते हुए औरतों को इस अमानवीय परंपरा से आजादी दिलाई और इस तरह केरल राज्य के आधुनिक सामाजिक ढांचे का मार्ग प्रशस्त हुआ।

आरक्षण विरोधियों को करारा जवाब, दलितों-पिछड़ों ने नहीं निकलने दिया एंटी रिजर्वेशन मार्च

आरक्षण विरोधियों को करारा जवाब, दलितों-पिछड़ों ने नहीं निकलने दिया एंटी रिजर्वेशन मार्च

Updated On: 2016-01-08 22:09:26 
होशियारपुर (पंजाब)। गुजरात में पटेल आंदोलन के बाद से गरम हुआ आरक्षण का मुद्दा अब पंजाब में पहुंच गया है। शुक्रवार को इसे लेकर प्रदेश के होशियारपुर जिले में स्थिति तनावपूर्ण बनी रही। राइट ऑफ इक्विलिटी फ्रंट के बैनर तले जनरल समाज द्वारा आरक्षण के खिलाफ मार्च निकालने को लेकर दलित-पिछड़े समाज के लोग भडक़ गए। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बैनर तले सडक़ों पर उतरे इन हजारों लोगों ने जमकर प्रदर्शन किया। इसे लेकर दिनभर स्थिति तनावपूर्ण बनी रही।

जनरल समाज की ओर से राइट ऑफ इक्विलिटी फ्रंट के बैनर तले 8 जनवरी को आरक्षण के खिलाफ मार्च निकालने का फैसला किया गया था। फ्रंट के मुताबिक आरक्षण व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए। तय कार्यक्रम के मुताबिक फ्रंट के बैनर तले जनरल समाज द्वारा यहां के माहिलपुर अड्डे से मिनी सचिवालय तक रोष मार्च निकाला जाना था। इसके बाद डिप्टी कमिश्नर को आरक्षण व्यवस्था खत्म किए जाने की मांग को लेकर मांगपत्र दिया जाना था।

दूसरी ओर दलित-पिछड़े समाज में आरक्षण के खिलाफ निकलने वाले इस मार्च को लेकर रोष फैला हुआ था। शुक्रवार को यह रोष भडक़ गया। बसपा नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ-साथ श्री गुरु रविदास सभाओं, भगवान वाल्मीकि सभाओं तथा दलित-पिछड़े समाज के अन्य हजारों लोग इस मामले को लेकर सडक़ों पर उतर आए।

एक तरफ जहां जनरल समाज के लोग माहिलपुर अड्डे पर आरक्षण विरोधी मार्च निकालने के लिए इकट्ठे हुए तो दूसरी ओर बसपा के बैनर तले दलित-पिछड़े समाज के लोग शहीद भगत सिंह चौक पर जुटने शुरू हो गए। दोपहर तक हजारों की गिनती में दलित-पिछड़े वर्ग के लोग शहीद भगत सिंह चौक पर पहुंच गए, जिन्होंने यहां सडक़ जाम कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसे लेकर माहौल गरम हो गया।

दलित-पिछड़े समाज के लोग, खासतौर पर बड़ी गिनती में पहुंचे युवा इस दौरान आरक्षण के समर्थन व बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर से संबंधित नारे लगाते रहे। उनके हाथों में बसपा के नीले झंडे व तख्तियां पकड़ी हुई थीं, जिनमें आरक्षण के समर्थन में नारे लिखे हुए थे।

दलित-पिछड़े समाज के भारी विरोध के चलते जनरल समाज की ओर से निकाला जाने वाला आरक्षण विरोधी मार्च माहिलपुर अड्डे से आगे नहीं बढ़ पाया। यहां तक कि राइट आफ इक्विलिटी फ्रंट प्रशासनिक अधिकारियों को अपना मांगपत्र भी नहीं दे पाया।

शहीद भगत सिंह चौक पर सुबह 10 बजे से जुटने वाले बसपाई, दलित-पिछड़े समाज के लोग रात तक यहां डटे रहे। इस बीच एसएसपी धनप्रीत कौर ने इन प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि संविधान विरोधी किसी भी मार्च को निकलने नहीं दिया जाएगा। इसके बाद जाकर लोग शांत हुए।

इस दौरान खास बात यह भी देखने को मिली कि आरक्षण के समर्थन में सिर्फ बसपा नेता व कार्यकर्ता ही नीले झंडे लेकर सडक़ पर उतरे, जबकि कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल व भाजपा के झंडे मौके से नदारद थे।

आज हम सरकारी नौकरियों में हैं लेकिन भविष्य मे शायद ना हो

[16/09 8:35 AM] डाॅ संदीप भारती: सरकारी निजी और contract वाली नौकरिया मिलाकर भारत में कुल 3 करोड़ से ज्यादा नौकरिया नहीं है । जबकि हर साल लगभग 1 करोड़ युवाओं को काम चाहिए । क्या ये संभव है कि नौकरिया सबको मिलेगी
[16/09 8:36 AM] डाॅ संदीप भारती: [23/08 5:35 PM] डाॅ संदीप भारतीय: चीन की आबादी 1.45 अरब है और वहाँ का करीब 46% MANPOWER पूरी तरह TRAINED है ।इसी तरह आस्ट्रेलिया का 65%, ब्रिटेन का 68%, जापान का 80% तथा SOUTH KOREA का 96% MANPOWER TRAINED है । दूसरी तरफ भारत का सिर्फ 2% MANPOWER TRAINED है ।हमारे युवाओं को व्यवसायिक ज्ञान नहीं दिया गया है वो नौकरियों की तलाश में मारे मारे घूमते रहते हैं 1 नौकरी के लिए 1000 आवेदन आ जाते हैं ।मतलब नौकरिया समस्या का समाधान नहीं है।
[23/08 5:51 PM] डाॅ संदीप भारतीय: इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने DIRECTORATE GENERAL OF EMPLOYMENT TRAINING, I. T. I. और APPRENTICESHIP TRAINING को MINISTERY OF SKILL DEVELOPMENT के अंतरगत समाहित किया है ।इस तरह देश के लगभग 12000 ITI अब सीधे तौर पर SKILL DEVELOPMENT MINISTERY के अधीन आ गए हैं ।मंत्रालय ने NATIONAL SKILLS QUALIFICATION FRAMEWORK भी बनाया है, जिसके तहत ही सारी TRAINING दी जाएगी ।इसी प्रक्रिया के तहत कौशल विकास केंद्र के रुप में UGC ने देश के कई संस्थानो को वित्तीय मदद मुहैया कराने पर सहमति जताई है ।इनमें वाराणसी का BHU और संपूरणानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, आगरा का दयालबाग EDUCATIONAL INSTITUTE, लखनऊ का NATIONAL PG COLLEGES, मेरठ का रघुनाथ GIRLS PG COLLEGE आदि शामिल हैं ।PRIVATE संस्थानो में बुलंदशहर का श्यामलाल सरस्वती डिग्री कालेज और मथुरा का श्री जी बाबा INSTITUTE है ।इसके अलावा, देश के कई और सरकारी-निजी संस्थान भी हैं जो अपनी पहल पर ऐसे COURSE संचालित कर रहे हैं, जिसके तहत युवाओं को SKILLED बनाया जा सके ।
[23/08 5:52 PM] डाॅ संदीप भारतीय: पर समस्या ये है बहुजन समाज के 90% युवा 12वीं मे ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं
[16/09 8:37 AM] डाॅ संदीप भारती: [05/07 4:05 PM] डाॅ संदीप भारती: भारत में सरकारी नौकरिया 1करोड़ 94 लाख                                      संगठित निजी क्षेत्र में 87 लाख         कुल = 2 करोड़ 81 लाख
[05/07 4:06 PM] डाॅ संदीप भारती: SC/ST के लिए 63 लाख
[05/07 4:08 PM] डाॅ संदीप भारती: सरकारी और निजी क्षेत्रो में आरक्षण को पूरा कर दिया जाए तो भी मात्र 63 लाख SC/ST को ही लाभ मिलेगा ।
[05/07 4:10 PM] डाॅ संदीप भारती: NATIONAL SAMPLE SURVEY के अनुसार कुल रोजगार का मात्र 8% भाग संगठित क्षेत्र (GOVT+PRIVATE ) शेष 92% असंगठित क्षेत्र में है
[05/07 4:11 PM] डाॅ संदीप भारती: सुखमय भविष्य की कल्पना असंगठित क्षेत्र में अधिक है
[05/07 4:14 PM] डाॅ संदीप भारती: HINDUSTAN LEVER LIMITED में 30000 निचले कुशल, अरधकुशल तथा अकुशल स्तर के अनुसूचित जातियों के करमचारी हैं
[05/07 4:15 PM] डाॅ संदीप भारती: कंपनी के PRODUCT बेचने के लिए देशभर में 2 लाख DISTRIBUTORS हैं
[05/07 4:15 PM] डाॅ संदीप भारती: हर DISTRIBUTOR एक महीने में लाखो रुपए कमाता होगा
[05/07 4:16 PM] डाॅ संदीप भारती: DISTRIBUTORS में अनुसूचित जातियों के लोग नहीं है
[05/07 4:17 PM] डाॅ संदीप भारती: द्विज वर्ग जानता है कि निजी क्षेत्र में SUPPLIER, DEALERS, तथा DISTRIBUTORS के रुप में अनुसूचित जातियों का सुनहरा भविष्य है
[16/09 8:41 AM] डाॅ संदीप भारती: 92% JOBS उद्योग व्यापार में हैं लेकिन इन क्षेत्रो में अनुसूचित जातियों को सिर्फ मजदूरी ही मिलती है । हम ते जानते हैं । SC/ST/OBC/MINORITY के लोग ROOT LEVEL पर काम करके चीजो को बनाते हैं लेकिन उन्हें रुपया ज्यादा नहीं मिलता वो उस रुपए में सिर्फ दो वक्त का खाना ही नसीब होता है
[16/09 8:42 AM] डाॅ संदीप भारती: उसी माल से SUPPLIER DEALERS DISTRIBUTORS लाखो करोड़ों बनाते हैं ।यहाँ सिर्फ द्विज वर्ग का कब्जा है
[16/09 8:54 AM] डाॅ संदीप भारती: PRODUCER SUPPLIER DEALERS और DISTRIBUTORS में PRODUCTION हम ही करते हैं । SUPPLIER DEALERS DISTRIBUTORS में हमारा प्रतिनिधित्व नहीं है ।
[16/09 8:59 AM] डाॅ संदीप भारती: समस्या का समाधान एक ही बसपा देश का कारोबार अपने हाथ में लिया जाए
[16/09 9:07 AM] डाॅ संदीप भारती: अनुसूचित जातियों के 90% युवा 10वी से पहले गरीबी की वजह से पढाई छोड़ने को मजबूर हैं
[16/09 9:13 AM] डाॅ संदीप भारती: सामाजिक और आर्थिक असमानता बहुत ज्यादा है । आज हम सरकारी नौकरियों में हैं लेकिन भविष्य मे शायद ना हो हमारे पास आय का दूसरा स्रोत भी नहीं है निकट भविष्य मे हमारा आर्थिक पतन निश्चित रुप से होगा अगर अभी ध्यान नहीं दिया ।
[16/09 9:16 AM] डाॅ संदीप भारती: सामाजिक और राजनीतिक शक्ति  ही समस्या का समाधान है
[16/09 9:16 AM] डाॅ संदीप भारती: सामाजिक शक्ति से आर्थिक शक्ति और राजनीतिक शक्ति प्राप्त की जा सकती है
[16/09 9:54 AM] डाॅ संदीप भारती: भारत में 10-24 साल की उम्र के करीब 35.6 करोड़ युवा हैं ।इसका मतलब है कि इनके लिए रोजगार के अनेक विकल्प होने चाहिए। लेबर ब्यूरो 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल करीब 1.2 करोड़ लोग WORKFORCE से जुड़ते हैं, जबकि सिर्फ 55 लाख नये जोब हर साल CREATE होते हैं ।इसी तरह ITI या दूसरे SKILL DEVELOPMENT CENTRES से TRAINED लोगों की बेरोजगारी दर करीब 14.5% है ।ऐसे में अगर युवाओं को रोजगार मिलता है, तो वह राष्ट्र निर्माण में अहम् भूमिका निभा सकते हैं ।

आरक्षण के सम्बन्ध में एक वीर रस गीत

आरक्षण के सम्बन्ध में एक वीर रस गीत

सुनो विरोधी आरक्षण के  याद दिलाने आये हैं  ।
आरक्षण है भीख नहीं हम तुम्हे बताने आये हैं ।।
सदियों से रक्खा है तुमने हमको झूठे वादों पर  ।
जग जाहिर अब हुवा तुम्हारा झूठ भाषण दलितों पर  ।1।
बाबा से   गांधी ने माँगा याद उसे भी कर लेना ।
पूना पेक्ट वाला समझौता आप उसे फिर पढ़ लेना । ।2।।
अलग देश थी मांग हमारी झूंठा हमको भरमाया ।
बात तुम्हारी मान गए थे बोलो हमने क्या पाया ।।3।।
बहुत सह लिया हमने अब तक आगे सहन नहीं होगा ।
हिन्दू धर्म की रक्षा खातिर अब बलिदान नहीं होगा ।।4।।
कर्माधार कहा था तुमने जन्माधार बना डाला ।
पशुओं से भी बदतर जीवन है दलितों का कर डाला ।।5।।
कुत्ता बिल्ली गाय गधा को  तुम पावन कहलाते हो ।
कामगार मेहनत कश लोगों को अछूत बतलाते हो ।।6।।
बड़े बड़े तुमको कहते थे बड़े नहीं तुम बन पाये ।
नहीं भर रहा पेट तुम्हारा हिस्सा मेरा भी खाये ।।7।।

होश में आओ आँखे खोलो अब विद्रोह बड़ा होगा ।
हर बहुजन साथ में होकर खड़ा सामने जब होगा ।।8।।
मिटे नाम हिन्दू भारत से परिवर्तन होने वाला ।
महास्वार्थी जागो वरना है अनर्थ होने वाला ।।9।।
पीड़ित समाज से
बिना दिए बलिदान बताओ कब आजादी मिल पायी
आगे बढ़ो छीन लो उनसे अब हिसाब पाई पाई ।।10।।
शर्म करो हे पच्चासी(85%) अब क्यों पंद्रह(15%) से हार रहे ।
दूध नहीं क्या पिया है मां का जो तुम पीछे देख रहे ।।11।।
अगर आज भी रहे जो सोते नहीं बचा कुछ पाओगे ।
आने वाली पीढ़ी को फिर कैसे मुह दिखलाओगे ।।12।।
        
जय भीम

तीस लाख लोगों को नौकरियों में आरक्षण

में एक समय में केवल तीस लाख लोगों को नौकरियों में आरक्षण मिलने की व्यवस्था है, बाकी 19 करोड़ 70 लाख लोगों से सवर्ण समाज आतंरिक सम्बन्ध क्यों नहीं स्थापित कर पाता है?
अतः यह बात फिर से
प्रमाणित होती है की आरक्षण जाति और जातिवाद को जन्म नहीं देता बल्कि जाति और जातिवाद लोगों की मानसिकता में पहले से ही विद्यमान है।
४- पांचवे तर्क का जवाब
प्रायः सवर्ण बुद्धिजीवी एवं मीडिया कर्मी फैलाते रहते हैं कि
आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए है, जब उनसे पूंछा जाता है कि आखिर कौन सा आरक्षण दस वर्ष के लिए है तो मुह से आवाज़ नहीं आती है।
इस सन्दर्भ में केवल इतना जानना चाहिए कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राजनैतिक आरक्षण जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और
332 में निहित है, 
उसकी आयु और उसकी समय-सीमा दस वर्ष निर्धारित की गयी थी।
नौकरियों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए
आरक्षण की कोई समय सीमा सुनिश्चित नहीं की गयी थी।
५- छठे तर्क का जवाब
आज की सवर्ण पीढ़ी अक्सर यह प्रश्न पूछती है कि हमारे पुरखों के अन्याय, अत्याचार, क्रूरता, छल कपटता, धूर्तता आदि की सजा आप वर्तमान पीढ़ी को क्यों दे रहे है?
इस सन्दर्भ में दलित युवाओं का मानना है कि आज की सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पूँजी का किसी न किसी के रूप में लाभ उठा रही है। वे अपने पूर्वजों के स्थापित किये गए
वर्चस्व एवं ऐश्वर्य का अपनी जाति के उपनाम, अपने कुलीन उच्च वर्णीय सामाजिक तंत्र, अपने सामाजिक मूल्यों, एवं मापदंडो, अपने तीज त्योहारों, नायकों, एवं नायिकाओं, अपनी परम्पराओ एवं भाषा और पूरी की पूरी ऐतिहासिकता का उपभोग कर रहे हैं।
क्या सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपने सामंती सरोकारों और सवर्ण वर्चस्व को त्यागने हेतु कोई पहल कर रही है?
कोई आन्दोलन या अनशन कर रही है? 
कितने धनवान युवाओ ने अपनी पैत्रिक संपत्ति को दलितों के उत्थान के लिए लगा दिया या फिर दलितों के साथ ही सरकारी स्कूल में ही रह कर पढाई करने की पहल की है?
जब तक ये युवा स्थापित मूल्यों की संरचना को तोड़कर नवीन संरचना कायम करने की पहल नहीं करते तब तक दलित समाज उनको भी उतना ही दोषी मानता रहेगा जितना की उनके
पूर्वजों को।
मंदिरों में घुसाया जाता है .....
जाति देखकर
किराये पर कमरा दिया जातै है...
जाति देखकर
होटल में खाना खिलाया जाता है..
जाति देखकर
कमरा किराये पर दिया जाता है..
जाति देखकर
मकान बेचा जाता है...
जाति देखकर
शादी विवाह कराये जाते है
जातिया देखकर,,,
वोट दिया जाता है.. 
जाति देखकर
मृत पशु उठवाये जाते है..
जाति देखकर
गाली दी जाती है.. 
जाति देखकर
साथ खाना खाते है.. 
जाति देखकर
बेगार कराई जाती है..
जाति देखकर
धिक्कारा जाता है.. 
जाति देखकर
बाल काटे जाते है..
जाति देखकर
ईर्ष्या पैदा होती है..
जाति देखकर
बलात्कार होते है ...
जाति देखकर
पर बेशर्मों आपको आरक्षण चाहिये आर्थिक आधार पर......
जाति आधारित समाज में समता के लिए आरक्षण
लोकतांत्रिक राष्ट्र में अत्यावश्यक है...
क्योंकि जाति है तो आरक्षण है.....
वरना संसार के
दूसरे किसी देश में जाति नहीं है इसलिये आरक्षण नहीं
है...
जातियां समाप्त करो 
आरक्षण अपने आप संमाप्त
हो जायेगा!
निवेदन की ज्यादा से ज्यादा लोगो तक भेजा जाय।